'रे' का अर्थ है- ब्रम्हांड और 'की' का अर्थ है- उर्जा
रेकी- अर्थात ब्रम्हांडीय उर्जा!
प्रकृति ने उपहार स्वरुप हमें जो जीवन दिया है, उसकी रक्षा भी तो प्रकृति स्वयं करती है, इसके द्वार स्वयं प्रभु भक्त ही खोलते है! हमारे विद्वानों का ये मानना है की हममे से कुछ ऐसे गुणवान प्राणी भी है जो रेकी को साथ लेकर ही पैदा हुए है और जो शेष इसे प्राप्त करना चाहते है, वे लोग इसे या तो तपस्या से प्राप्त करते है या फिर रेकी प्रशिक्षण लेकर! रेकी उपचार को आधुनिक युग का सबसे बड़ा अविष्कार कहा जा सकता है,यह बिना किसी ओषधि के असाध्य रोगों से मुक्त कर देती है!
रेकी (霊気 या レイキˈreɪikiː) एक आध्यात्मिक अभ्यास पद्धति है
जिसका विकास १९२२ में मिकाओ उसुई ने किया था। यह तनाव और उपचार संबंधी एक जापानी विधि है,
जो काफी कुछ योग जैसी है। मान्यता अनुसार रेकी का असली उदगम स्थल भारत है।
सहस्रों वर्ष पूर्व भारत में स्पर्श चिकित्सा का ज्ञान था। अथर्ववेद में इसके प्रमाण पाए गए हैं।
यह विद्या गुरु-शिष्य परंपरा के द्वारा मौखिक रूप में विद्यमान रही।
लिखित में यह विद्या न होने से धीरे-धीरे इसका लोप होता चला गया।
ढाई हजार वर्ष पहले बुद्ध ने ये विद्या अपने शिष्यों को सिखाई जिससे देशाटन के समय जंगलों में घूमते
हुए उन्हें चिकित्सा सुविधा का अभाव न हो और वे अपना उपचार कर सकें।
भगवान बुद्ध की 'कमल सूत्र' नामक किताब में इसका कुछ वर्णन है।
यहाँ से यह भिक्षुओं के साथ तिब्बत और चीन होती हुई जापान तक पहुँची है।
जापान में इसे पुनः खोजने का काम जापान के संत डॉक्टर मिकाओ उसुई ने अपने
जीवनकाल १८६९-१९२६ में किया था। इसकी विचारधारा अनुसार ऊर्जा जीवित प्राणियों से ही प्रवाहित होती है।
रेकी के विशेषज्ञों का मानना है कि अदृश्य ऊर्जा को जीवन ऊर्जा या की कहा जाता है और
यह जीवन की प्राण शक्ति होती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि " की " हमारे आस-पास ही है
और उसे मस्तिष्क द्वारा ग्रहण किया जा सकता है।
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